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Showing posts from December, 2025

वो आख़िरी मैसेज

 रात के 11 बज चुके थे। मोबाइल की स्क्रीन बार-बार जल रही थी, लेकिन इस बार कोई मैसेज नहीं था… सिर्फ़ वक़्त का एहसास था। आरव ने फोन टेबल पर रखा और खिड़की से बाहर देखा। शहर अब भी जाग रहा था, पर उसके अंदर कुछ चुप हो चुका था। आज पूरे तीन साल हो गए थे उसे गए हुए। रिया। ना कोई झगड़ा, ना कोई शिकायत… बस एक दिन उसने कहा था — “शायद हम एक-दूसरे के लिए नहीं बने।” उसके बाद सब कुछ धीरे-धीरे ख़ामोश हो गया। आरव आज भी हर रात सोने से पहले उसी चैट को खोलता था, जहाँ आख़िरी मैसेज लिखा था — “ख़याल रखना… अपना भी।” कितना अजीब होता है ना? कोई इंसान आपकी ज़िंदगी से चला जाता है, लेकिन उसकी कही एक लाइन पूरी ज़िंदगी आपके साथ चलती रहती है। आज पहली बार उसने उस चैट को डिलीट करने का सोचा। उँगली स्क्रीन पर गई… पर दिल काँप गया। उसी पल एक नोटिफिकेशन आया — Unknown Number: “क्या हम कभी सच में किसी को भूल पाते हैं?” उसका दिल तेज़ धड़कने लगा। नंबर सेव नहीं था, लेकिन सवाल बहुत जाना-पहचाना लगा। उसने जवाब नहीं दिया। बस फोन बंद कर दिया। कुछ रिश्ते जवाब नहीं माँगते… वो बस याद बनकर रह जाते हैं। उस रात उसे ...

वह खामोश पिता

कहते हैं माँ बोलती है, पिता समझते हैं। लेकिन सच तो यह है कि कई बार पिता भी सब कुछ कहना चाहते हैं, बस शब्द नहीं ढूँढ पाते। रवि जब छोटा था, तो उसके पिता रमेश जी उसे रोज़ स्कूल छोड़ने जाते थे। रास्ते में ज़्यादा बात नहीं होती थी। बस कभी-कभी इतना पूछ लेते— “पढ़ाई ठीक चल रही है न?” रवि हाँ में सिर हिला देता और बात वहीं खत्म हो जाती। उसे लगता था कि उसके पिता को उसकी ज़िंदगी में कोई दिलचस्पी ही नहीं है। दोस्तों के पिता जैसे हँसते-बोलते थे, वैसे उसके पिता कभी नहीं दिखे। न तारीफ़, न डाँट — बस एक चुप्पी। समय बीतता गया। स्कूल के बाद कॉलेज, फिर नौकरी। जिम्मेदारियाँ बढ़ती गईं और बातचीत कम होती गई। पिता अब पहले से भी ज़्यादा चुप रहने लगे थे। रवि को लगता था, “शायद मैं उनके लिए कुछ खास नहीं हूँ।” एक दिन अचानक पिता की तबीयत बिगड़ गई। अस्पताल के सफेद कमरों में खामोशी और गहरी हो गई। डॉक्टर बाहर आए और बोले, “अब ज्यादा समय नहीं है।” रवि की आँखें भर आईं। पहली बार उसे डर लगा कि वो अपने पिता को सच में खो सकता है। अगले दिन पिता ने धीमी आवाज़ में कहा, “रवि… थोड़ा पास आओ।” रवि पास बैठ गया। “मैं बोल...

जमशेदपुर की वो दोस्ती जो वक़्त से हार गई

 जमशेदपुर सिर्फ़ एक शहर नहीं था हमारे लिए, वह हमारी दोस्ती की पहली क्लास थी। साकची की तंग गलियाँ, बिष्टुपुर का खुला मैदान, और टाटा स्टील के गेट के बाहर खड़े होकर भविष्य के सपने बुनना — यही हमारी दुनिया थी। हम चार दोस्त थे — मैं, राहुल, पिंकी और सौरभ। स्कूल सेंट मेरीज़ में था। यूनिफॉर्म एक जैसी थी, पर सपने अलग-अलग। सुबह की प्रार्थना में एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा देना ही हमारी सबसे बड़ी बातचीत होती थी। टिफ़िन में आधा-आधा बाँटना, पीटी पीरियड में छुपकर बैठ जाना और एग्ज़ाम से पहले “कुछ नहीं पढ़ा” कहकर एक-दूसरे से झूठ बोलना — सब कुछ आज भी याद है। स्कूल खत्म हुआ तो लगा दोस्ती अब और मज़बूत होगी। कॉलेज ग्रेजुएशन के लिए सब जमशेदपुर में ही रहे — कोई कोऑपरेटिव कॉलेज, कोई करीम सिटी। अब हम बड़े हो रहे थे। चाय अब साकची गोलचक्कर पर होती थी, बातें अब लड़कियों, करियर और “सेटल होने” की होने लगी थीं। लेकिन दोस्ती अब भी वैसी ही थी — बिना शर्त। फिर आया वो समय, जब ज़िंदगी ने अपनी शर्तें रखनी शुरू कीं। राहुल को रांची में नौकरी मिल गई। पिंकी की शादी तय हो गई और वह जमशेदपुर से बाहर चली गई। सौरभ दिल...

दिल्ली, मैं और मेरा परिवार

 दिल्ली की एक पुरानी कॉलोनी में हमारा घर था—छोटा, मगर जिम्मेदारियों से भरा हुआ। बाहर से देखने पर सब सामान्य लगता था, लेकिन उस घर के भीतर हर दिन एक अनकही जंग चलती रहती थी। पापा की नौकरी निजी कंपनी में थी, जहाँ काम कभी ख़त्म नहीं होता था। माँ पूरा दिन घर संभालतीं, पर उनकी मेहनत को कभी “काम” नहीं माना गया। पापा अक्सर थके हुए और चिड़चिड़े रहते। माँ ज़्यादा कुछ कहती नहीं थीं, लेकिन उनकी चुप्पी सबसे ज़्यादा डरावनी होती थी। मैं बीच में फँसा रहता—कभी पापा का गुस्सा सहता, कभी माँ की नम आँखें देखता। मुझे समझ नहीं आता था कि परिवार में सही कौन है और ग़लत कौन, क्योंकि हर कोई अपने-अपने दर्द में सही था। पैसों की कमी ने रिश्तों को इतना कस दिया था कि प्यार बोलने की चीज़ नहीं, बस याद करने की चीज़ बन गया था। दिल्ली की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में हम सब साथ रहते हुए भी अलग-अलग हो गए थे। एक ही घर में रहकर भी हम एक-दूसरे से दूर थे। फिर एक दिन माँ अचानक बीमार पड़ीं। अस्पताल की ठंडी बेंच पर बैठकर पापा पहली बार टूटते हुए दिखे। उसी दिन मैंने उन्हें माँ का हाथ थामे देखा—बिना किसी शिकायत के। उस पल समझ आया कि प...

मुंबई और हम

मुंबई में प्यार अक्सर जल्दी मिलता है और उतनी ही जल्दी खो भी जाता है। मैं और वह रोज़ लोकल ट्रेन के उसी डिब्बे में मिलते थे—भीड़, पसीना और शोर के बीच हमारी खामोशी धीरे-धीरे बातों में बदल गई। चाय की दुकानों पर अधूरी मुलाक़ातें, मरीन ड्राइव की हवा में लंबे सपने और बारिश में भीगती उम्मीदें—सब कुछ बहुत असली लगने लगा था। पर मुंबई सिर्फ़ सपनों का शहर नहीं, ज़िम्मेदारियों का भी है। उसकी नौकरी पुणे ले गई और मेरी ज़िंदगी यहीं अटक गई। हमने कहा था कि दूरी कुछ नहीं बदलती, पर सच्चाई यह थी कि हर दिन के साथ हम थोड़ा-थोड़ा खोते गए। आज भी जब चर्चगेट पर ट्रेन रुकती है, भीड़ वही है, शहर वही है—बस वह नहीं है। मुंबई ने हमें मिलाया, और शायद इसी शहर ने हमें सिखाया कि हर प्यार मुकम्मल नहीं होता, कुछ सिर्फ़ याद बनकर रह जाते हैं।

एक छोटी-सी बात दिल पर लग गई

 आज सुबह सब normal था। बस घर में एक छोटी सी बात को लेकर बहस हो गई। असल में बात कुछ खास नहीं थी, पर शायद मन पहले से भरा हुआ था… इसलिए दिल पर लग गई। कई बार सोचता/सोचती हूँ कि हम सब अंदर से इतने थके हुए रहते हैं कि छोटी चीजें भी चोट कर देती हैं। किससे कहूँ, क्या कहूँ — समझ नहीं आया। बस लगा यहाँ लिख दूँ तो शायद मन हल्का हो जाए।

पहला प्यार या आखिरी!

मेरा नाम शायद उतना मायने नहीं रखता, जितना मेरी पहचान… और मेरी पहचान यही है कि मैं आज भी नेहा से मोहब्बत करता हूँ। हाँ, नेहा—यही नाम है उसका। गौर सा रंग, सुनहरी सी आँखें, गुलाबी गाल… एक मासूम चेहरा। जब मैं उससे पहली बार मिला था, तो बस उसे ही देखता रह गया था—एकटक। और वो…? वो भी मुझे ही देख रही थी। पता नहीं… शायद ये मेरी गलतफ़हमी थी, या फिर उसे देखना इतना अच्छा लग रहा था कि ये ध्यान ही नहीं रहा कि उसकी नज़रें कब मुझ पर पड़ीं। हमारी कई बार मुलाकातें हुईं, पर बात कभी नहीं हो पाई। या शायद… मुझमें हिम्मत ही नहीं थी उससे बात करने की। आज उस बात को कई साल बीत चुके हैं। और आज… अचानक फिर मुलाकात हो गई—बाज़ार में। उसके हाथों में किसी और का हाथ था… और दोनों बहुत खुश दिख रहे थे। हो भी क्यों न? उनकी लव मैरेज जो हुई थी। लव मैरेज… हाँ, मतलब वो किसी और से प्यार करती थी, और मैं… मैं तो सिर्फ़ नज़रों के मिलने को ही प्यार समझ बैठा था। सच कहूँ तो, उसे इतने सालों बाद देखकर अच्छा लगा। क्यों? पता नहीं…  पर अच्छा लगा।

पहली नौकरी का प्रेशर

पहली नौकरी मिली तो सोचा था बहुत खुश रहूँगा। पर अब समझ आ रहा है कि responsibility के साथ pressure भी आता है। गलती हो जाए तो डर लगता है… लोग क्या सोचेंगे, job चली न जाए… रात को भी दिमाग बंद नहीं होता। काश कोई ऐसा दोस्त होता जिससे खुलकर बात कर सकूँ। इसलिए यहाँ लिख दिया — शायद थोड़ा हल्का महसूस हो।   

Dil To Toda Nahi, Par ....

  Dil To Toda Nahi, Par Bharosa Zaroor Tod Diya हम dating में नहीं थे… बस बहुत close थे। एक-दूसरे से हर बात share करते थे। मैंने कभी कुछ expect नहीं किया, बस इतना कि honesty रहे। लेकिन एक दिन पता चला कि मेरी ही बातें उसने किसी और को बताई थीं। बस उसी दिन से अंदर कुछ टूट गया। मैंने दूरी बना ली, उसने भी contact कम कर दिया। लोग कहते हैं “breakup kab hua?” पर kya jawab doon… Relation to tha hi नहीं… फिर भी दर्द breakup से कम भी नहीं है।

एक छोटी-सी बात दिल पर लग गई

आज सुबह सब normal था। बस घर में एक छोटी सी बात को लेकर बहस हो गई। असल में बात कुछ खास नहीं थी, पर शायद मन पहले से भरा हुआ था… इसलिए दिल पर लग गई। कई बार सोचता हूँ कि हम सब अंदर से इतने थके हुए रहते हैं कि छोटी चीजें भी चोट कर देती हैं। किससे कहूँ, क्या कहूँ — समझ नहीं आया। बस लगा यहाँ लिख दूँ तो शायद मन हल्का हो जाए।