वह खामोश पिता
कहते हैं माँ बोलती है, पिता समझते हैं। लेकिन सच तो यह है कि कई बार पिता भी सब कुछ कहना चाहते हैं, बस शब्द नहीं ढूँढ पाते। रवि जब छोटा था, तो उसके पिता रमेश जी उसे रोज़ स्कूल छोड़ने जाते थे। रास्ते में ज़्यादा बात नहीं होती थी। बस कभी-कभी इतना पूछ लेते— “पढ़ाई ठीक चल रही है न?” रवि हाँ में सिर हिला देता और बात वहीं खत्म हो जाती। उसे लगता था कि उसके पिता को उसकी ज़िंदगी में कोई दिलचस्पी ही नहीं है। दोस्तों के पिता जैसे हँसते-बोलते थे, वैसे उसके पिता कभी नहीं दिखे। न तारीफ़, न डाँट — बस एक चुप्पी। समय बीतता गया। स्कूल के बाद कॉलेज, फिर नौकरी। जिम्मेदारियाँ बढ़ती गईं और बातचीत कम होती गई। पिता अब पहले से भी ज़्यादा चुप रहने लगे थे। रवि को लगता था, “शायद मैं उनके लिए कुछ खास नहीं हूँ।” एक दिन अचानक पिता की तबीयत बिगड़ गई। अस्पताल के सफेद कमरों में खामोशी और गहरी हो गई। डॉक्टर बाहर आए और बोले, “अब ज्यादा समय नहीं है।” रवि की आँखें भर आईं। पहली बार उसे डर लगा कि वो अपने पिता को सच में खो सकता है। अगले दिन पिता ने धीमी आवाज़ में कहा, “रवि… थोड़ा पास आओ।” रवि पास बैठ गया। “मैं बोल...