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पापा की चुप्पी: एक पिता और बेटी के अनकहे प्यार की कहानी

पापा ज़्यादा बोलते नहीं थे। घर में उनकी मौजूदगी आवाज़ से नहीं, कामों से महसूस होती थी। सुबह सबसे पहले उठना, अख़बार के साथ चाय पीना और बिना किसी शिकायत के रोज़ दफ़्तर निकल जाना—यही उनकी दुनिया थी। मेरे लिए पापा हमेशा थोड़े सख़्त रहे। न हँसी में ज़्यादा साथ, न बातों में। जब मैं छोटी थी, तो सोचती थी—शायद उन्हें मुझसे ज़्यादा प्यार नहीं है। माँ ही थीं जो मेरी हर बात सुनतीं। पापा बस दूर से देखते रहते। स्कूल की पहली रेस जीती थी मैंने। सब ताली बजा रहे थे। मैंने पापा की तरफ़ देखा—वो बस हल्का सा मुस्कराए। उस दिन मुझे लगा, उन्हें फ़र्क़ ही नहीं पड़ा। वक़्त बीतता गया। मैं बड़ी होती गई, और उनके चेहरे की लकीरें गहरी। मेरे सपने उड़ान भरने लगे, और पापा और ज़्यादा ख़ामोश। कॉलेज दूसरे शहर में मिला। मैं बहुत खुश थी। पापा ने बस इतना कहा— “ध्यान रखना अपना।” स्टेशन पर उन्होंने ज़्यादा कुछ नहीं कहा। बस मेरा बैग ठीक किया, और जेब में चुपके से कुछ पैसे रख दिए। वहाँ, पहली बार समझ आया— पापा बोलते नहीं, निभाते हैं। सालों बाद जब मैं नौकरी में स्थिर हुई, एक दिन फ़ोन आया—पापा अस्पताल में थे। ...

घाट पर छूटा हुआ एक वाक्य

 बनारस की सुबह हमेशा अलग होती है। घाट पर गंगा की लहरें, घंटियों की आवाज़ और धूप में उड़ता धुआँ—सब कुछ जैसे समय से बाहर हो। उसी सुबह, दशाश्वमेध घाट पर वो बैठा था। हाथ में चाय का कुल्हड़, आँखों में थकान और मन में कुछ अनकहे सवाल। वो बनारस पढ़ने आया था, लेकिन खुद को समझने लगा था। घर से दूर, पहली बार इतना अकेला। तभी पास आकर एक बुज़ुर्ग साधु बैठ गए। बिना देखे बोले, “बेटा, बनारस सवालों का नहीं, जवाबों का शहर है।” वो मुस्कुरा दिया। जवाब तो उसे भी चाहिए थे, पर सवाल इतने थे कि गिनती भूल गया था। साधु जी ने गंगा की ओर इशारा किया। “देखो, ये बहती है, फिर भी वही रहती है। इंसान रुक जाता है, इसलिए टूटता है।” कुछ देर दोनों चुप रहे। घाट पर आरती की तैयारी शुरू हो गई थी। भीड़ बढ़ रही थी, लेकिन उसके भीतर कुछ हल्का हो रहा था। उसने कहा, “सब कुछ होते हुए भी खालीपन लगता है।” साधु ने उसकी ओर देखा—पहली बार। “खालीपन इसलिए लगता है क्योंकि तुम खुद से भागते रहे। बनारस भागने नहीं देता।” आरती शुरू हुई। दीप गंगा में उतरे। हर दीप के साथ जैसे एक बोझ बहता गया। आरती खत्म हुई। उसने मुड़कर देखा—साधु नहीं ...