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दिल्ली, मैं और मेरा परिवार

 दिल्ली की एक पुरानी कॉलोनी में हमारा घर था—छोटा, मगर जिम्मेदारियों से भरा हुआ। बाहर से देखने पर सब सामान्य लगता था, लेकिन उस घर के भीतर हर दिन एक अनकही जंग चलती रहती थी। पापा की नौकरी निजी कंपनी में थी, जहाँ काम कभी ख़त्म नहीं होता था। माँ पूरा दिन घर संभालतीं, पर उनकी मेहनत को कभी “काम” नहीं माना गया। पापा अक्सर थके हुए और चिड़चिड़े रहते। माँ ज़्यादा कुछ कहती नहीं थीं, लेकिन उनकी चुप्पी सबसे ज़्यादा डरावनी होती थी। मैं बीच में फँसा रहता—कभी पापा का गुस्सा सहता, कभी माँ की नम आँखें देखता। मुझे समझ नहीं आता था कि परिवार में सही कौन है और ग़लत कौन, क्योंकि हर कोई अपने-अपने दर्द में सही था। पैसों की कमी ने रिश्तों को इतना कस दिया था कि प्यार बोलने की चीज़ नहीं, बस याद करने की चीज़ बन गया था। दिल्ली की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में हम सब साथ रहते हुए भी अलग-अलग हो गए थे। एक ही घर में रहकर भी हम एक-दूसरे से दूर थे। फिर एक दिन माँ अचानक बीमार पड़ीं। अस्पताल की ठंडी बेंच पर बैठकर पापा पहली बार टूटते हुए दिखे। उसी दिन मैंने उन्हें माँ का हाथ थामे देखा—बिना किसी शिकायत के। उस पल समझ आया कि प...

एक छोटी-सी बात दिल पर लग गई

 आज सुबह सब normal था। बस घर में एक छोटी सी बात को लेकर बहस हो गई। असल में बात कुछ खास नहीं थी, पर शायद मन पहले से भरा हुआ था… इसलिए दिल पर लग गई। कई बार सोचता/सोचती हूँ कि हम सब अंदर से इतने थके हुए रहते हैं कि छोटी चीजें भी चोट कर देती हैं। किससे कहूँ, क्या कहूँ — समझ नहीं आया। बस लगा यहाँ लिख दूँ तो शायद मन हल्का हो जाए।

पहला प्यार या आखिरी!

मेरा नाम शायद उतना मायने नहीं रखता, जितना मेरी पहचान… और मेरी पहचान यही है कि मैं आज भी नेहा से मोहब्बत करता हूँ। हाँ, नेहा—यही नाम है उसका। गौर सा रंग, सुनहरी सी आँखें, गुलाबी गाल… एक मासूम चेहरा। जब मैं उससे पहली बार मिला था, तो बस उसे ही देखता रह गया था—एकटक। और वो…? वो भी मुझे ही देख रही थी। पता नहीं… शायद ये मेरी गलतफ़हमी थी, या फिर उसे देखना इतना अच्छा लग रहा था कि ये ध्यान ही नहीं रहा कि उसकी नज़रें कब मुझ पर पड़ीं। हमारी कई बार मुलाकातें हुईं, पर बात कभी नहीं हो पाई। या शायद… मुझमें हिम्मत ही नहीं थी उससे बात करने की। आज उस बात को कई साल बीत चुके हैं। और आज… अचानक फिर मुलाकात हो गई—बाज़ार में। उसके हाथों में किसी और का हाथ था… और दोनों बहुत खुश दिख रहे थे। हो भी क्यों न? उनकी लव मैरेज जो हुई थी। लव मैरेज… हाँ, मतलब वो किसी और से प्यार करती थी, और मैं… मैं तो सिर्फ़ नज़रों के मिलने को ही प्यार समझ बैठा था। सच कहूँ तो, उसे इतने सालों बाद देखकर अच्छा लगा। क्यों? पता नहीं…  पर अच्छा लगा।

पहली नौकरी का प्रेशर

पहली नौकरी मिली तो सोचा था बहुत खुश रहूँगा। पर अब समझ आ रहा है कि responsibility के साथ pressure भी आता है। गलती हो जाए तो डर लगता है… लोग क्या सोचेंगे, job चली न जाए… रात को भी दिमाग बंद नहीं होता। काश कोई ऐसा दोस्त होता जिससे खुलकर बात कर सकूँ। इसलिए यहाँ लिख दिया — शायद थोड़ा हल्का महसूस हो।