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घाट पर छूटा हुआ एक वाक्य

 बनारस की सुबह हमेशा अलग होती है। घाट पर गंगा की लहरें, घंटियों की आवाज़ और धूप में उड़ता धुआँ—सब कुछ जैसे समय से बाहर हो। उसी सुबह, दशाश्वमेध घाट पर वो बैठा था। हाथ में चाय का कुल्हड़, आँखों में थकान और मन में कुछ अनकहे सवाल। वो बनारस पढ़ने आया था, लेकिन खुद को समझने लगा था। घर से दूर, पहली बार इतना अकेला। तभी पास आकर एक बुज़ुर्ग साधु बैठ गए। बिना देखे बोले, “बेटा, बनारस सवालों का नहीं, जवाबों का शहर है।” वो मुस्कुरा दिया। जवाब तो उसे भी चाहिए थे, पर सवाल इतने थे कि गिनती भूल गया था। साधु जी ने गंगा की ओर इशारा किया। “देखो, ये बहती है, फिर भी वही रहती है। इंसान रुक जाता है, इसलिए टूटता है।” कुछ देर दोनों चुप रहे। घाट पर आरती की तैयारी शुरू हो गई थी। भीड़ बढ़ रही थी, लेकिन उसके भीतर कुछ हल्का हो रहा था। उसने कहा, “सब कुछ होते हुए भी खालीपन लगता है।” साधु ने उसकी ओर देखा—पहली बार। “खालीपन इसलिए लगता है क्योंकि तुम खुद से भागते रहे। बनारस भागने नहीं देता।” आरती शुरू हुई। दीप गंगा में उतरे। हर दीप के साथ जैसे एक बोझ बहता गया। आरती खत्म हुई। उसने मुड़कर देखा—साधु नहीं ...

एक छोटी-सी बात दिल पर लग गई

 आज सुबह सब normal था। बस घर में एक छोटी सी बात को लेकर बहस हो गई। असल में बात कुछ खास नहीं थी, पर शायद मन पहले से भरा हुआ था… इसलिए दिल पर लग गई। कई बार सोचता/सोचती हूँ कि हम सब अंदर से इतने थके हुए रहते हैं कि छोटी चीजें भी चोट कर देती हैं। किससे कहूँ, क्या कहूँ — समझ नहीं आया। बस लगा यहाँ लिख दूँ तो शायद मन हल्का हो जाए।

पहला प्यार या आखिरी!

मेरा नाम शायद उतना मायने नहीं रखता, जितना मेरी पहचान… और मेरी पहचान यही है कि मैं आज भी नेहा से मोहब्बत करता हूँ। हाँ, नेहा—यही नाम है उसका। गौर सा रंग, सुनहरी सी आँखें, गुलाबी गाल… एक मासूम चेहरा। जब मैं उससे पहली बार मिला था, तो बस उसे ही देखता रह गया था—एकटक। और वो…? वो भी मुझे ही देख रही थी। पता नहीं… शायद ये मेरी गलतफ़हमी थी, या फिर उसे देखना इतना अच्छा लग रहा था कि ये ध्यान ही नहीं रहा कि उसकी नज़रें कब मुझ पर पड़ीं। हमारी कई बार मुलाकातें हुईं, पर बात कभी नहीं हो पाई। या शायद… मुझमें हिम्मत ही नहीं थी उससे बात करने की। आज उस बात को कई साल बीत चुके हैं। और आज… अचानक फिर मुलाकात हो गई—बाज़ार में। उसके हाथों में किसी और का हाथ था… और दोनों बहुत खुश दिख रहे थे। हो भी क्यों न? उनकी लव मैरेज जो हुई थी। लव मैरेज… हाँ, मतलब वो किसी और से प्यार करती थी, और मैं… मैं तो सिर्फ़ नज़रों के मिलने को ही प्यार समझ बैठा था। सच कहूँ तो, उसे इतने सालों बाद देखकर अच्छा लगा। क्यों? पता नहीं…  पर अच्छा लगा।

पहली नौकरी का प्रेशर

पहली नौकरी मिली तो सोचा था बहुत खुश रहूँगा। पर अब समझ आ रहा है कि responsibility के साथ pressure भी आता है। गलती हो जाए तो डर लगता है… लोग क्या सोचेंगे, job चली न जाए… रात को भी दिमाग बंद नहीं होता। काश कोई ऐसा दोस्त होता जिससे खुलकर बात कर सकूँ। इसलिए यहाँ लिख दिया — शायद थोड़ा हल्का महसूस हो।