मुंबई और हम

मुंबई में प्यार अक्सर जल्दी मिलता है और उतनी ही जल्दी खो भी जाता है।

मैं और वह रोज़ लोकल ट्रेन के उसी डिब्बे में मिलते थे—भीड़, पसीना और शोर के बीच हमारी खामोशी धीरे-धीरे बातों में बदल गई। चाय की दुकानों पर अधूरी मुलाक़ातें, मरीन ड्राइव की हवा में लंबे सपने और बारिश में भीगती उम्मीदें—सब कुछ बहुत असली लगने लगा था।

पर मुंबई सिर्फ़ सपनों का शहर नहीं, ज़िम्मेदारियों का भी है। उसकी नौकरी पुणे ले गई और मेरी ज़िंदगी यहीं अटक गई। हमने कहा था कि दूरी कुछ नहीं बदलती, पर सच्चाई यह थी कि हर दिन के साथ हम थोड़ा-थोड़ा खोते गए।

आज भी जब चर्चगेट पर ट्रेन रुकती है, भीड़ वही है, शहर वही है—बस वह नहीं है।
मुंबई ने हमें मिलाया, और शायद इसी शहर ने हमें सिखाया कि हर प्यार मुकम्मल नहीं होता, कुछ सिर्फ़ याद बनकर रह जाते हैं।

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