जमशेदपुर की वो दोस्ती जो वक़्त से हार गई
जमशेदपुर सिर्फ़ एक शहर नहीं था हमारे लिए, वह हमारी दोस्ती की पहली क्लास थी। साकची की तंग गलियाँ, बिष्टुपुर का खुला मैदान, और टाटा स्टील के गेट के बाहर खड़े होकर भविष्य के सपने बुनना — यही हमारी दुनिया थी।
हम चार दोस्त थे — मैं, राहुल, पिंकी और सौरभ।
स्कूल सेंट मेरीज़ में था। यूनिफॉर्म एक जैसी थी, पर सपने अलग-अलग। सुबह की प्रार्थना में एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा देना ही हमारी सबसे बड़ी बातचीत होती थी। टिफ़िन में आधा-आधा बाँटना, पीटी पीरियड में छुपकर बैठ जाना और एग्ज़ाम से पहले “कुछ नहीं पढ़ा” कहकर एक-दूसरे से झूठ बोलना — सब कुछ आज भी याद है।
स्कूल खत्म हुआ तो लगा दोस्ती अब और मज़बूत होगी।
कॉलेज ग्रेजुएशन के लिए सब जमशेदपुर में ही रहे — कोई कोऑपरेटिव कॉलेज, कोई करीम सिटी। अब हम बड़े हो रहे थे। चाय अब साकची गोलचक्कर पर होती थी, बातें अब लड़कियों, करियर और “सेटल होने” की होने लगी थीं। लेकिन दोस्ती अब भी वैसी ही थी — बिना शर्त।
फिर आया वो समय, जब ज़िंदगी ने अपनी शर्तें रखनी शुरू कीं।
राहुल को रांची में नौकरी मिल गई।
पिंकी की शादी तय हो गई और वह जमशेदपुर से बाहर चली गई।
सौरभ दिल्ली चला गया, “कुछ बड़ा करने” के लिए।
और मैं… मैं यहीं रह गया — घर की ज़िम्मेदारियों के साथ।
पहले फोन आते थे — हफ्ते में दो बार।
फिर महीने में एक बार।
फिर त्योहारों पर।
व्हाट्सऐप ग्रुप अब भी था, पर उसमें सिर्फ़ “Happy Birthday” और “Good Morning” रह गया था।
वो देर रात की बातें, वो बिना वजह की हँसी — सब पीछे छूट गया।
कई साल बाद, एक दिन अचानक टाटा मेन हॉस्पिटल के बाहर राहुल से मुलाकात हो गई।
वो वही था, पर वैसा नहीं। आँखों में थकान थी।
हम दोनों ने पूछा — “कैसे हो?”
और दोनों ही झूठ बोले — “सब ठीक।”
हम पास बैठे, पर बातें दूर-दूर की थीं।
काम, जिम्मेदारी, बच्चों की पढ़ाई, EMI — दोस्ती कहीं बीच में दब गई थी।
आज हम चारों अलग-अलग शहरों में हैं।
शायद अब कभी वैसे साथ नहीं बैठ पाएँगे।
पर जब भी जमशेदपुर की बारिश की खुशबू आती है,
या बिष्टुपुर की सड़क पर कोई पुराना गाना सुनाई देता है,
तो दिल अपने आप कह उठता है —
“कभी हमारे पास वक़्त था, और हम दोस्त थे।”
दोस्ती खत्म नहीं होती,
बस ज़िंदगी उसे रोज़ निभाने का वक़्त नहीं देती।
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Kripya personal number ya identity share na karein.