पापा की चुप्पी: एक पिता और बेटी के अनकहे प्यार की कहानी

पापा ज़्यादा बोलते नहीं थे।

घर में उनकी मौजूदगी आवाज़ से नहीं, कामों से महसूस होती थी। सुबह सबसे पहले उठना, अख़बार के साथ चाय पीना और बिना किसी शिकायत के रोज़ दफ़्तर निकल जाना—यही उनकी दुनिया थी।

मेरे लिए पापा हमेशा थोड़े सख़्त रहे।
न हँसी में ज़्यादा साथ, न बातों में।
जब मैं छोटी थी, तो सोचती थी—शायद उन्हें मुझसे ज़्यादा प्यार नहीं है।

माँ ही थीं जो मेरी हर बात सुनतीं।
पापा बस दूर से देखते रहते।

स्कूल की पहली रेस जीती थी मैंने।
सब ताली बजा रहे थे।
मैंने पापा की तरफ़ देखा—वो बस हल्का सा मुस्कराए।
उस दिन मुझे लगा, उन्हें फ़र्क़ ही नहीं पड़ा।

वक़्त बीतता गया।
मैं बड़ी होती गई, और उनके चेहरे की लकीरें गहरी।
मेरे सपने उड़ान भरने लगे, और पापा और ज़्यादा ख़ामोश।

कॉलेज दूसरे शहर में मिला।
मैं बहुत खुश थी।
पापा ने बस इतना कहा—
“ध्यान रखना अपना।”

स्टेशन पर उन्होंने ज़्यादा कुछ नहीं कहा।
बस मेरा बैग ठीक किया, और जेब में चुपके से कुछ पैसे रख दिए।

वहाँ, पहली बार समझ आया—
पापा बोलते नहीं, निभाते हैं।

सालों बाद जब मैं नौकरी में स्थिर हुई,
एक दिन फ़ोन आया—पापा अस्पताल में थे।

कमज़ोर से दिख रहे थे।
पहली बार मुझे डर लगा—
अगर पापा न रहे तो?

मैं उनके पास बैठी थी।
उन्होंने मेरा हाथ थामा।
आवाज़ काँप रही थी।

“तू… जैसा चाहती थी वैसी बन गई,”
बस इतना कहा।

उस एक वाक्य में वो सब था,
जो वो पूरी ज़िंदगी नहीं बोल पाए।

आज भी पापा ज़्यादा नहीं बोलते।
पर अब मैं समझ चुकी हूँ—
उनकी ख़ामोशी ही मेरा सबसे मज़बूत सहारा थी।

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