Part 2: कुछ रिश्ते पूरी तरह खत्म नहीं होते

तलाक को दो साल बीत चुके थे।

ज़िंदगी दोनों की आगे बढ़ चुकी थी—कम से कम बाहर से देखने पर ऐसा ही लगता था।

आरव अब पहले से ज़्यादा काम करता था। ऑफिस, घर और फिर ऑफिस। लोगों को लगता था कि वह अपने करियर में व्यस्त है, लेकिन सच यह था कि वह खाली समय से डरता था। क्योंकि जैसे ही वह अकेला होता, पुरानी बातें लौट आतीं।

उधर नंदिनी ने भी खुद को संभाल लिया था। नई नौकरी, नया शहर और एक नई दिनचर्या। उसने जीना तो सीख लिया था, लेकिन भूलना नहीं।

दोनों ने कभी दोबारा शादी नहीं की।

शायद वजह अलग-अलग थीं, लेकिन नतीजा एक ही था।

एक दिन आरव को अपने पुराने शहर जाना पड़ा। उसी शहर में जहाँ उसकी शादी हुई थी, जहाँ उसका घर बसा था और जहाँ उसका रिश्ता टूटा था।

काम खत्म होने के बाद वह यूँ ही पुराने पार्क की ओर चला गया। वही पार्क जहाँ कभी वह और नंदिनी शाम को टहला करते थे।

बहुत कुछ बदल चुका था।

लेकिन एक चीज़ नहीं बदली थी।

वहीं सामने वाली बेंच।

और उस बेंच पर बैठी हुई एक महिला।

नंदिनी।

आरव कुछ क्षणों तक वहीं खड़ा रहा। उसे लगा शायद वह कोई और होगी। लेकिन फिर नंदिनी ने सिर उठाया।

दोनों की नज़रें मिलीं।

समय जैसे कुछ पल के लिए रुक गया।

न कोई फ़िल्मी संगीत था, न कोई नाटकीय दृश्य।

बस दो लोग थे, जिनके बीच कभी एक पूरा जीवन था।

"कैसी हो?" आरव ने पूछा।

नंदिनी हल्का-सा मुस्कुराई।

"ठीक हूँ। तुम?"

"ठीक हूँ।"

दोनों जानते थे कि यह दुनिया का सबसे बड़ा झूठ था।

कुछ देर तक दोनों चुप बैठे रहे।

फिर नंदिनी बोली,

"याद है? तुम हमेशा इसी बेंच पर बैठना चाहते थे।"

आरव हँसा।

"और तुम हमेशा दूसरी वाली पर।"

दोनों पहली बार खुलकर मुस्कुराए।

बातें शुरू हुईं।

काम की, शहर की, मौसम की।

उन सब चीज़ों की, जिनका उनके टूटे हुए रिश्ते से कोई लेना-देना नहीं था।

शायद दोनों उस असली विषय से बच रहे थे।

लेकिन कुछ बातें हमेशा देर से ही सही, सामने आ ही जाती हैं।

"मैंने तुम्हें बहुत गलत समझा था," आरव ने आखिर कहा।

नंदिनी कुछ नहीं बोली।

"और सबसे बड़ी गलती यह थी कि मैंने तुम्हारी बात सुनने के बजाय दूसरों की बातों पर भरोसा किया।"

हवा कुछ पल के लिए और शांत हो गई।

"मुझे गुस्सा उस बात का नहीं था," नंदिनी ने धीरे से कहा।

"फिर किस बात का था?"

"इस बात का कि तुमने मुझसे पूछने के बजाय दुनिया पर भरोसा किया।"

आरव के पास कोई जवाब नहीं था।

क्योंकि वह सही थी।

बहुत बार रिश्ते किसी बड़ी गलती से नहीं टूटते।

वे टूटते हैं क्योंकि एक व्यक्ति बोलना बंद कर देता है और दूसरा सुनना।

सूरज धीरे-धीरे ढलने लगा।

पार्क खाली होने लगा।

"क्या तुम्हें कभी लगता है कि अगर उस दिन हम थोड़ा और बात कर लेते तो सब बच सकता था?" आरव ने पूछा।

नंदिनी ने कुछ क्षण सोचा।

"हाँ।"

बस एक शब्द।

लेकिन उस एक शब्द में दो साल का दर्द था।

कुछ देर बाद दोनों उठ खड़े हुए।

इस बार विदाई पहले जैसी नहीं थी।

अब कोई गुस्सा नहीं था।

कोई आरोप नहीं था।

कोई सफाई नहीं थी।

सिर्फ़ समझ थी।

जाते-जाते नंदिनी रुकी।

"जानते हो, सबसे दुखद बात क्या है?"

"क्या?"

"हमारा रिश्ता गलत इंसानों की वजह से नहीं टूटा। वो हमारी अपनी चुप्पी की वजह से टूटा।"

आरव ने सिर झुका लिया।

वह सही कह रही थी।

कई बार दुनिया सिर्फ़ आग में हवा देती है।

लेकिन आग लगती तब है, जब घर के अंदर भरोसा कमज़ोर पड़ जाए।

दोनों अलग-अलग दिशाओं में चल पड़े।

शायद इस बार हमेशा के लिए।

लेकिन इस बार दिल में कड़वाहट नहीं थी।

सिर्फ़ एक सीख थी—

रिश्ते बचाने के लिए प्यार से ज़्यादा ज़रूरी है संवाद।

क्योंकि जहाँ बातचीत खत्म हो जाती है, वहाँ अक्सर गलतफहमियाँ अपनी कहानी लिखना शुरू कर देती हैं।

Comments

Popular posts from this blog

दिल्ली, मैं और मेरा परिवार

पहली नौकरी का प्रेशर

Two Stranger, One Journey