मन का बोझ

कभी जो डाँट लगती थी बुरी, वही एक दिन सबसे बड़ी सीख बन जाती है।

बचपन में माँ-बाप की डाँट बहुत बुरी लगती थी।

ऐसा लगता था जैसे वो हमें समझते ही नहीं, जैसे हर गलती बस हमारी ही होती है।

मुझे आज भी याद है वो दिन, जब मैंने बस थोड़ी देर दोस्तों के साथ खेलने के लिए झूठ बोल दिया था। बात छोटी थी, लेकिन घर पहुँचते ही पापा की आवाज़ तेज़ हो गई।
“इतना भी समझ नहीं है? झूठ बोलते हो अब?”

माँ भी चुप नहीं रहीं।
उनकी बातें और चुभ गईं।

उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा।
इतना कि मन में अजीब-अजीब ख्याल आने लगे—
“काश मैं यहाँ से चला जाऊँ…”
“काश कोई मुझे समझे…”

कमरे में जाकर मैंने दरवाज़ा बंद कर लिया।
रोया भी… और खुद से वादा किया कि अब उनसे बात नहीं करूँगा।

लेकिन अगले ही दिन सब सामान्य हो गया।
ज़िंदगी ऐसे ही आगे बढ़ती रही।

समय बीतता गया।
स्कूल खत्म हुआ, कॉलेज आया, फिर नौकरी।
ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं… और समझ भी।

अब जब कभी ऑफिस में छोटी-सी गलती पर डाँट पड़ती,
तो वही पुरानी चुभन महसूस होती—
लेकिन इस बार गुस्से से ज़्यादा सोच आती।

धीरे-धीरे एहसास हुआ कि डाँट हमेशा नफ़रत से नहीं आती,
कई बार वो डर से आती है—
खो देने के डर से, गलत रास्ते पर चले जाने के डर से।

एक दिन अचानक पुरानी बातें याद आ गईं।
वो झूठ, वो डाँट, वो बंद कमरा…
और वो बचपना, जो हर बात को अपने खिलाफ़ समझ बैठता था।

उस दिन पहली बार लगा—
शायद मैं ग़लत था।

माँ-पापा को कभी समझने की कोशिश ही नहीं की।

शाम को घर गया।
माँ रसोई में थीं, पापा अख़बार पढ़ रहे थे।
सब कुछ वैसा ही था, लेकिन इस बार नज़र बदल चुकी थी।

मैं उनके पास बैठा।
कुछ देर चुप रहा, फिर धीरे से कहा—
“पापा… उस दिन आपने जो डाँटा था… वो सही था।”

उन्होंने चौंककर देखा, फिर हल्का-सा मुस्कुरा दिए।

शायद उन्हें याद भी नहीं था वो दिन,
पर मेरे अंदर वो बात सालों से दबकर बैठी थी।

उस दिन मन हल्का हो गया।

और आज, जब मैं ये कहानी लिख रहा हूँ,
तो समझ आता है—
हमारे अंदर जो बोझ होता है, वो दूसरों की वजह से नहीं,
हमारी अधूरी समझ की वजह से होता है।

कभी-कभी…
बस एक बात कह देने से,
सालों का बोझ उतर जाता है।

Comments

Popular posts from this blog

दिल्ली, मैं और मेरा परिवार

पहली नौकरी का प्रेशर

Two Stranger, One Journey