शायद मैं ही गलत थी…

कभी सोचा नहीं था कि शादी के बाद ज़िंदगी ऐसी होगी।

बचपन से सुना था—शादी के बाद लड़की का घर बस जाता है।
पर मेरा घर… बस कभी बन ही नहीं पाया।

शुरुआत में सब ठीक था।
नए रिश्ते, नए लोग, नई उम्मीदें।
मैंने पूरी कोशिश की—हर किसी को खुश रखने की, हर बात मानने की, हर छोटी गलती पर खुद को बदलने की।

लेकिन धीरे-धीरे समझ आने लगा कि यहाँ “मैं” की कोई जगह नहीं है।

मेरी पसंद मायने नहीं रखती थी,
मेरी थकान दिखाई नहीं देती थी,
और मेरी बात… अक्सर बीच में ही काट दी जाती थी।

अगर मैं चुप रहती, तो कहा जाता—“तुम्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता।”
अगर बोलती, तो—“बहुत जवाब देने लगी हो।”

शायद सच में मैं ही गलत थी…
कम बोलना चाहिए था,
या शायद बिल्कुल ही नहीं।

कई रातें ऐसी गुज़री हैं, जब सब सो गए और मैं जागती रही।
सोचती रही कि आखिर कमी कहाँ है।
क्या मैं अच्छी पत्नी नहीं हूँ?
क्या मैं समझदार नहीं हूँ?

सबसे ज़्यादा दर्द तब होता था, जब अपनी ही बात कहने में डर लगता था।
जब हँसने से पहले सोचना पड़ता था कि कहीं किसी को बुरा तो नहीं लगेगा।

धीरे-धीरे मैंने बोलना कम कर दिया।
अपनी बातें अपने अंदर रखने लगी।
और एक दिन एहसास हुआ—मैं खुद से भी दूर हो गई हूँ।

आज जब ये सब लिख रही हूँ, तो कोई बड़ा फैसला लेने के लिए नहीं…
बस इसलिए कि जो अंदर जमा है, वो थोड़ा बाहर आ सके।

शायद मेरी कहानी अलग नहीं है।
शायद बहुत सी महिलाएँ ऐसा ही महसूस करती होंगी, बस कह नहीं पातीं।

मैं अभी भी वही हूँ—
जो हँसना चाहती है,
जो सुनी जाना चाहती है,
जो बस थोड़ा-सा अपना होना चाहती है।

और अगर ये लिखकर थोड़ा हल्का महसूस हो रहा है,
तो शायद ये शुरुआत है—
खुद को फिर से पाने की।

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