दोस्ती, जो वक़्त से आगे निकल गई

 हम तीनों की दोस्ती की शुरुआत किसी बड़े वादे से नहीं हुई थी।

बस एक ही बेंच, एक ही टिफ़िन और एक ही शिकायत—“ये टीचर बहुत ज़्यादा होमवर्क देते हैं।”

स्कूल के वो दिन कब बीत गए, पता ही नहीं चला।
कॉलेज पहुँचे तो ज़िंदगी थोड़ी तेज़ हो गई, और सपने थोड़े बड़े। कोई इंजीनियर बनना चाहता था, कोई घर से दूर जाकर कुछ साबित करना चाहता था। मैं बस इतना जानता था कि इन दोनों के बिना कॉलेज अधूरा लगेगा।

हर शाम चाय की टपरी, घंटों की बातें और भविष्य के प्लान—जो शायद कभी पूरे न होने थे।
फिर ज़िंदगी ने अपनी शर्तें रख दीं।

एक को नौकरी मिल गई दूसरे शहर में।
दूसरा घर की ज़िम्मेदारियों में बँध गया।
और मैं… मैं बीच में कहीं रह गया।

ग्रुप आज भी वही है, नाम भी वही, पर बातें कम हो गईं।
अब “कहाँ हो?” से ज़्यादा “सब ठीक है?” पूछा जाता है।

कई बार मन करता है सब कुछ छोड़कर उसी टपरी पर लौट जाऊँ।
पर समझ आ गया है—दोस्ती हमेशा साथ रहने का नाम नहीं होती,
कभी-कभी साथ छूटने के बाद भी जो बची रहे, वही असली दोस्ती होती है।

पिछले साल अचानक मुलाक़ात हुई।
वही हँसी, वही मज़ाक—बस वक़्त की कुछ लकीरें चेहरे पर थीं।

हम ज़्यादा देर नहीं रुके।
पर जाते-जाते किसी ने कहा,
“कुछ भी हो, हम हैं न।”

शायद यही दोस्ती है।
कम बातों में भी पूरी।

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