एक दिन का असर

सुबह की शुरुआत हमेशा जैसी नहीं होती। उस दिन भी अलार्म बजा, लेकिन नींद पूरी नहीं हुई थी। मोबाइल हाथ में लेते ही ऑफिस का मैसेज दिखा—“आज रिपोर्ट ज़रूरी है।” मन पहले से ही भारी हो गया।

नाश्ते की मेज़ पर बैठते ही घर का माहौल और बिगड़ गया।
“तुम्हें हमेशा देर ही क्यों होती है?”
“बच्चे की फीस याद है या नहीं?”
आवाज़ें तेज़ थीं, शब्द चुभने वाले। जवाब में कुछ कहना चाहता था, पर शब्द उलझ गए। चुप रहा, लेकिन चुप्पी भी कभी-कभी गुस्से से भरी होती है।

घर से निकला तो मन पहले ही खराब था। रास्ते में ट्रैफिक, बस की भीड़, और हर चेहरे पर वही जल्दी। ऑफिस पहुँचा तो बॉस ने बिना देखे कहा, “काम ठीक से किया करो।” शायद उनकी भी सुबह कुछ खास नहीं रही थी।

डेस्क पर बैठा, लेकिन दिमाग काम में नहीं लगा। तभी एक सहकर्मी फाइल लेकर आया और बोला, “यह ज़रा देख दोगे?”
आवाज़ सामान्य थी, पर जवाब कड़वा निकल गया—“खुद नहीं देख सकते?”

वो चुपचाप चला गया। उसकी आँखों में कुछ टूटता हुआ दिखा, लेकिन तब ध्यान नहीं गया।
दोपहर में फोन आया—बच्चे का। स्कूल से। “पापा, आज आप आओगे?”
“अभी बिज़ी हूँ,” कहकर फोन काट दिया। शायद वो सिर्फ़ आवाज़ सुनना चाहता था।

शाम तक थकान गुस्से में बदल चुकी थी। रास्ते में एक ऑटो वाले से बहस हो गई। शब्द ऐसे थे, जो बाद में याद आकर शर्मिंदा करते हैं। ऑटो वाला भी पलटकर बोला—उसका भी दिन शायद ऐसा ही था।

घर लौटा तो बच्चा चुप था। पत्नी ने खाना परोसा, बिना कुछ कहे। कमरे में अजीब सी ख़ामोशी थी। तभी बच्चे ने धीरे से कहा, “पापा, आज टीचर ने कहा था आप बहुत अच्छे हो।”

वाक्य छोटा था, लेकिन दिल पर ज़ोर से लगा। पूरे दिन की बातें एक-एक कर सामने आने लगीं—सुबह की डाँट, ऑफिस का गुस्सा, सहकर्मी की चुप्पी, बच्चे का टूटा हुआ इंतज़ार।

समझ आया कि मन का खराब होना किसी एक का नहीं होता, वो फैलता है। एक से दूसरे तक, बिना इजाज़त।
और सबसे आसान होता है—उसे किसी और पर उतार देना।

रात को बच्चे के पास बैठा। उसके बाल सहलाए।
“सॉरी,” कहा—शायद खुद से ज़्यादा उसे।

उस दिन कुछ नहीं बदला—न नौकरी, न ज़िम्मेदारियाँ।
बस एक बात समझ आई—
अगर सुबह घर में डाँट खाए हों, तो ज़रूरी नहीं कि पूरा दिन किसी और का मन खराब करके गुज़रे।

कभी-कभी एक गहरी साँस,
एक नरम जवाब,
पूरे दिन का असर बदल सकता है।

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