मैं, नया साल और वो

 नया साल आने वाला था। शहर रोशनी से भरा हुआ था, हर तरफ़ जश्न की तैयारी, लेकिन मेरे भीतर अजीब-सी ख़ामोशी थी। शायद इसलिए क्योंकि इस बार नया साल किसी नई शुरुआत का नहीं, बल्कि एक आख़िरी मुलाक़ात का गवाह बनने वाला था।

वो मुझे स्टेशन के पास वाले कैफ़े में मिली। वही जगह, जहाँ कभी हम घंटों बैठा करते थे — बिना वजह हँसते, बिना वजह सपने बुनते। आज सब कुछ वैसा ही था, बस हम दोनों बदल चुके थे। उसके चेहरे पर मुस्कान थी, पर आँखों में वही पुरानी थकान। और मेरी आँखों में… शायद एक सवाल, जिसका जवाब मैं जानता था।

“कैसी हो?” मैंने पूछा।
“ठीक हूँ… तुम?” उसने कहा, जैसे ये सवाल सिर्फ़ रस्म हो।

हमने कॉफी मँगाई। बाहर लोग गिनती शुरू कर चुके थे — दस… नौ… आठ…
और अंदर, हमारे बीच ख़ामोशी गिनती बढ़ा रही थी।

उसने कहा, “शायद ये हमारी आख़िरी मुलाक़ात है।”
मैं मुस्कुरा दिया। कुछ जवाब ऐसे होते हैं जो ज़ुबान से नहीं, आँखों से दिए जाते हैं।

वक़्त बदल चुका था। ज़िम्मेदारियाँ आ गई थीं — नौकरी, घर, रिश्ते… और उन सबके बीच हम कहीं खो गए थे। न कोई शिकवा था, न शिकायत। बस हालात थे, जो हमसे बड़े हो गए थे।

घड़ी ने बारह बजाए। लोग चीख़े, गले मिले, नए साल की बधाइयाँ दीं।
और हम?
हमने बस एक-दूसरे को देखा।

उसने धीरे से कहा, “ख़्याल रखना… और खुश रहना।”
मैंने सिर हिलाया। शायद यही सबसे बड़ा वादा था जो हम निभा सकते थे।

वो चली गई। भीड़ में कहीं खो गई।
और मैं वहीं खड़ा रहा — नए साल के पहले पल में, पुराने प्यार के आख़िरी एहसास के साथ।

कुछ रिश्ते पूरी ज़िंदगी साथ नहीं चलते,
पर ज़िंदगी भर साथ रहते हैं… यादों में।

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